Saturday, 9 September 2017

एक ग़ज़ल देखें 
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ज़ुल्म  हो  जब  भी  लड़ जाईये 
ख़ौफ़   बन   कर  उभर   जाईये 

हौसला    है   अग र  आप    में 
पार   दरिया   को   कर   जाईये 

इतनी  हिम्मत नहीं हो तो फिर 
इससे   बेहतर   है   मर   जाईये 

दुसरा    कोई    गुलशन    नहीं 
यह  चमन    है  निखर  जाईये 

कल  ज़माने  को  एहसास  हो 
छोड़  कर  कुछ  असर  जाईये 

'ज़ीनत'  जी   खूबसूरत  ग़ज़ल 
पढ़  के  दिल  में  उतर  जाईये 
--कमला सिंह 'ज़ीनत'

Wednesday, 30 August 2017

खु़दाया खै़र करे
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जब दिल के बंधन खुलते हैं
खुश्बू के रस रस घुलते हैं
तू याद बहुत ही आता है
अनजाने में तड़पाता है
तेरी यारा ऐसी लत लागी
मैं कब सोई और कब जागी
तू काहे मुझसे बैर करे
मेरे अंदर अंदर सैर करे
तेरा यार खु़दाया खै़र करे
तेरा यार खु़दाया खै़र करे।
__कमला सिंह "जी़नत"

Wednesday, 23 August 2017

ग़ज़ल हाज़िर है 
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जो   ज़बानो   -ब्यान   वाले   हैं 
बस    वही   दास्तान   वाले   हैं 

बालों पर की ख़बर नहीं जिनको 
पूछिए    तो    उड़ान   वाले    हैं 

शैख़  शजरा  दिखा  के कहता है 
हम  ही  बस  आन बान  वाले हैं 

बोझ  अपना भी जो उठा न सके 
फ़क्र    है   खानदान    वाले   हैं 

जो   गरीबों   का   खून  पीते थे 
आज   वह   दरम्यान   वाले  हैं 

'ज़ीनत'  सुन  रंगो-बू-जुदागाना 
अपनी  अपनी   दूकान  वाले हैं 
--कमला सिंह 'ज़ीनत'

Thursday, 17 August 2017

मेरी एक ग़ज़ल देखें 
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आग दिल में लगाने से क्या फ़ायदा 
अपना ही घर जलाने से क्या फ़ायदा 

जब परिंदे ना चहकेंगे कल शाख पर 
इस चमन को बचाने से क्या फ़ायदा 

इल्म के साथ हासिल न हो अक्ल तो 
बे -वजह  फैज़ पाने से  क्या फ़ायदा 

आज तो  हम तुम्हारे मुक़ाबिल नहीं 
अब  हमें  आज़माने से क्या  फ़ायदा  

आँख  बरसे   नहीं , रूह  तड़पे  नहीं 
यूँ ग़ज़ल गुनगुनाने से क्या फ़ायदा 

बेरुखी ऐसी  'ज़ीनत' उन आँखों में है 
बेसबब आने- जाने  से क्या फ़ायदा 
---कमला सिंह 'ज़ीनत'

Tuesday, 15 August 2017

एक ग़ज़ल देखें 
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क़िस्मत का मेरे यारों जब टूटा सितारा था 
इक  मेरे  सहारे  को  बस  मेरा  खुदारा था 

गर्दिश ने जो घेरा तो कुछ काम  नहीं आया 
कहने  के लिए यूँ तो  कश्ती  का सहारा था 

हम  सब्र से  बैठे  थे चीख़ा ना  गुज़ारिश की 
सर काट के ज़ालिम भी मज़लूम से हारा था 

हर शब् को उतरते थे हम पर ही कई आफ़त 
मुश्किल  की  घटाएँ  थीं घर एक हमारा था 

हर हाल में बस 'ज़ीनत ' हम ज़ेर रहे दम तक 
कोई   ना  सहारा  था  ,कोई  ना  हमारा  था 
----कमला सिंह ' ज़ीनत'

Saturday, 8 July 2017

एक ग़ज़ल 
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जब  वो   मेरी  नज़र  हो  गया 
खुद-ब-खुद मोअत्तबर हो गया 

एक   खाली   मकाँ    हम   रहे 
वो  दिलो  जां  ज़िगर  हो  गया 

अब   कोई  और  चौखट   नहीं
आख़री   मेरा   दर   हो   गया  

धुप   आती   नहीं    राह     में 
राह   का   वो  शजर  हो  गया 

रफ़्ता-  रफ़्ता   मेरी   चाह   में 
कितना  वो  बालातर  हो  गया  

दिल का 'ज़ीनत' वो है बादशाह 
दौलते   मालो  ज़र   हो   गया 

---कमला सिंह 'ज़ीनत '

Monday, 3 July 2017

एक ग़ज़ल देखें 
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आग  हरसू  लगाए  फिरते  हो 
बादलों   को   डराए  फिरते  हो 

कौन  जाने की कब ख़ुदा बदले 
आजकल  बुत  उठाए फिरते हो 

कितने  मासूम  खा  गए धोका 
ऐसी   सूरत  बनाए   फिरते  हो 

अंधे   बहरों  के   बीच  ऐ  साधू 
कौन  सा  धुन सुनाए फिरते हो 

अपनी  मुट्ठी में  आँधियाँ  लेकर 
रौशनी  को   बुझाए   फिरते  हो 

'ज़ीनत' तो पर्दा कर गयी कब की 
लाश  किसकी  उठाए  फिरते  हो 
---कमला सिंह 'ज़ीनत '